Saturday, March 19, 2011

हर रंग से रंग दे...

रंग पर्व की अशेष शुभकामनायें...भारतीय संस्कृति की पहचान बन चुके इस महान रंगोत्सव में आपकों अपनी एक छोटी सी रचना सादर समर्पित करता हूँ...


हर रंग से रंग दे...

रंग मुझे हर रंग से रंग दे,रंग से रंग दे भंग से रंग दे,
रंग मुझे हर रंग से रंग दे...
श्याम वर्ण सुन्दर से रंग दे,मथुरा की हुड़दंग से रंग दे,
रंग मझे हर रंग से रंग दे...
नील कण्ठ हरहर से रंग दे,जानकी-वल्लभ रम से रंग दे,
रंग मुझे हर रंग से रंग दे...
गौरवर्ण गोपीन की गागर,चाल थिरकती मद से रंग दे,पनघट के पेड़ों पर अंगिया,श्याम ठठोली हद से रंग दे,
रंग मुझे हर रंग से रंग दे...
रास नचाते कान्हा पर हर गोपीन के उस मान से रंग दे,उद्धव की बुद्धी पर भारी ब्रज की उस पहचान से रंग दे,
रंग मुझे हर रंग से रंग दे...
रंग ठिठौली,रंग भंगौली रंग रंग संसार को रंग दे,
तम को रंग दे,बद को रंग दे रंग किसी अभिमान को रंग दे,
इन्द्रधनुष छा जाये नभ पर रंग किसी मुस्कान को रंग दे....


पुनः रंगोत्सव की हार्दिक शुभकामनायें.....
आपका,
संजय उपाध्याय,
बिलासपुर

Saturday, March 12, 2011

न्यूटन्स लॉ आफ सोशियो इकोनामिक मोशन

सेठ गुलमोहर दास के घर पर मजमा लगा हुआ था... जितने लोग सेठ जी के बारामदे तक पहुंचने में कामायब हो पाये थे उससे क़रीब बीस गुना ज्यादा लोग सेठ जी के सोने से चमचमाते बड़े फाटक के बाहर आस लगाये बैठे थे... सभी ने अपने खीसे में अपनी औका़त के हिसाब से रंग गुलाल की छोटी बड़ी पुड़िया बांध रखी थी... लेकिन सेठ के गेट के भीतर बारामदे तक पहुंचने में वे लोग ही कामयाब हो पाये थे जिन्होने यह भरोसा दिलाया था कि उनके खीसे में रखे रंग विलायती हैं... अब बेचारे फागू को क्या मालूम की विदेशों में होली खेली भी जाती है या नही... लेकिन एक बार जो फागू को यह समझाने में क़ामयाब हो गया तो उसके लिये बारामदे में जगह पक्की हो गयी... सेठ के मुंहलगे चमचे फागू को यह ताकी़द किया गया थी कि सेठ तक सस्ता रंग या गुलाल किसी भी हालत में ना पहुंचे... अब यह बात अलग थी कि रंगों की गुणवत्ता परखने का फागू का अपना अलग पैमाना था... फागू की कृपा से सेठ गुलमोहर की चौखट तक पहुंच चुके लोगों की धड़कनें मानो उनका साथ नही दे पा रही थीं... लोग बेसब्र हुये जा रहे थे कि कब सेठ बाहर निकले और उन्हे अपने खीसे में रखे खुशबुदार रंगों कि नुमाईश का मौका मिले... रंगों से लिपटी खुशबू उड़ ना जाये इसलिये कई दावेदारों ने अपने जेब की मुठ्ठी भी बांध रखी थी... माथे की बात तो कोसो दूर ये स्वामी भक्त तो यही सोच कर सिहर रहे थे कि आज उन्हे अपने हाथों से सेठ जी के चरणों के तिलक वन्दन का सौभाग्य प्राप्त होगा... बेसब्री का यही आलम बड़े फाटके के बाहर भी था... फागू को समझाने की सारी कोशिशे नाका़मयाब होने के बाद भी आस ने हार नही मानी थी... बड़े फाटक पर इनकी मौजूदगी भले सेठ जी ना जान सकें लेकिन इन लोगों को इस बात से ही काफी संतोष था कि फागू ने उन्हे घण्टों या कहें दिन के अंतिम क्षणों तक यहां लगातार बेसब्र होते देखा था...

सेठ गुलमोहर दास का दर्जा नवरंग पुर गांव में उनके भक्तों के लिये भैरव का और दुश्मनों के लिये लादेन सा था... मतलब दोनों ही उनसे हद की इंतेहा तक भय खाते थे... सेठ गुलमोहर दास को यह दर्जा हासिल किये ज्यादा वक़्त नही गुजरा था... गुलपरचुनिया का नाम अब तक नवरंगपुर वासियों के जहन में ताजा था... लेकिन इस बात का जिक्र करने का साहस किसी में भी नही था... अब तो नवरंगपुर के जमींदार की विराट हवेली में भी चमगादड़ बोलने लगे थे... गुलपरचुनिया को आधा सेर खराब चोट्टा देने की सजा देते हुये तब जमींदार ने भद्दी गालियों के साथ जुर्माना भी ठोक दिया था... घर घर घुम कर लोगों से चिरौरी विनती कर किसी तरह परचुन बेचने वाले गुलपरचुनिया ने यह जुर्माना किस तरह पटाया इसका पूरा गांव आज भी गवाह है... जुर्माना पटाने के लिये उसे तीन पखवाड़े तक एक जून का खाना पीना छोड़ना पड़ा था... यह ऐसा वक्त था जब गुलपरचुनिया विनम्रता, सौम्यता और दर्द होने पर भी हंसते चेहरे का प्रतीक था.. झुककर बड़े छोटों का अभिवादन और साथ ही गांव की मण्डली में खुद को शामिल करवाने की चिरौंजी गुलपरचुनिया के नित्य कर्म का हिस्सा थी... नवरंगपुर के किसी वासी को इस बात का अंदाजा नही था कि एक लाटरी पूरे गांव की तस्वीर बदल देगी... और गांव का कौड़ी पति गुलपरचुनिया गांव ही नहीं बल्कि पूरी रियासत का सबसे धनी और रुतबेदार सेठ बन जायेगा... किसी ने सपने में भी यह सोचने की जहमत नहीं की थी कि विनम्रता और सौम्यता से अभिवादन को झुका गुलपरचुनिया सेठ गुलमोहर दास बनने के साथ ही ना केवल इतन तन जायेगा बल्कि पीठ की ओर इतना अकड़ भी जायेगा... कभी गुलपरचुनिया पर जुर्माना ठोकने वाला और गांव का जमींदार रहा गुलाल सिंह अब लोगों से मिन्नते करता और उनके पैरों पर गिरता फिरता... उसकी एक ही इच्छा थी कि वह एक बार सेठ से मिलकर अपने गुनाहों का प्रायाश्चि कर ले... सेठ के कोप से सब कुछ लुट जाने के बाद भी किसी अतिरिक्त अनिष्ट का भय गुलाल सिंह का पीछा नही छोड़ता... गुलाल सिंह के इस हालात पर सहसा किसी को यक़ीन नही होता... एक वक्त था कि गुलाल सिंह की हवेली तो दूर हवेली के रास्ते पर किसी की मौजूदगी उस पर जुर्माने के लिये काफी थी... आज वही गुलाल सिंह लोगों से झुककर मिन्नते कर रहा था... गुलाल सिंह की यह हालत देख कर नवरंगपुर का हर आदमी सिहर उठता... वह रात भर करवटे बदलता सिर्फ यही सोचता कि किभी अंजाने में भी उसने गुलपरचुनिया से कोई बदतमीजी तो नही की...

कुबेर का पर्याय बन चुके सेठ ने अपने धन वैभव के दम पर ऐसा चक्कर चलाया था कि जहां जमींदार गुलाल सिंह की जमीन सरकार ने फाईलों में जप्त कर ली थीं वहीं हवेली भी बाबूओं की फाईलों में जा समायी थी... गुलाल सिंह सालों दफ्तरों के चक्कर काटता रहा लेकिन उसकी फाईलें तो मानो अंगद के पैर की तरह जम सी चुकी थीं... लाखों मिन्नते और दुहाईयों के बाद भी उसमें कोई हलचल पैदा नही हुयी... आखिर फाईलों में पैर लगाने के लिये जिस शिष्टाचार की जरुरत थी उसे गुलाल सिंह कैसे पूरा करता... सब कुछ लुटने के बाद उसके नवाबी शौक ने उसे ढ़ेले ढ़ेले को मुहताज़ बना ड़ाला... गुलाल सिंह के भीतर अपनी जमींदारी हासिल करने की तनिक भी इच्छा नही थी वह तो सिर्फ इतना चाहता था कि उसे जमीन का सिर्फ एक टुकड़ा ही मिल जाये जिसे बेचकर वह इस गांव से हमेशा के लिये विदाई ले ले और किसी दूर गांव में अपनी दाल रोटी का इंतज़ाम कर ले... किसी तरह कर्ज लेकर गुलाल सिंह ने सरकारी दफ्तरों के बाबूओं को डालियां चढ़ायीं... शिष्टाचार के धक्के से गुलाल सिंह की फाईलें चलनी शुरू तो हो गयीं लेकिन जहां जाती वहां अपने साथ बाबूओं से लिये अपेक्षायें लेकर जातीं... बेचार गुलाल सिंह कितनों को संतुष्ट कर पाता... यही वजह थी कि फाईले अपने मुक़ाम तक पहुंचने के पहले ही बार बार वापस लौट आती... शिष्टाचार का सेवन कर चुके लोग इसे बार बार आगे बढ़ाते और इर्ष्यालू इसे बार बार वापस भेज देते... मतलब फाईल की गति निरंतर जारी रही...

एक तरफ जहां गुलाल सिंह अपनी बाकी जिन्दगी अभाव में ही सही जीने की जद्दोजहद में लगा हुआ था वहीं दूसरी ओर इसी जिले में रहने वाला एक बड़ा आसामी सेठ गुलमोहर दास को पटखनी देने की तैयारी कर रहा था... रूतबे में सेठ से उन्नीस ही सही मगर ब्रिजलाल की पहुंच डिस्ट्रीक बोर्ड के रसूखदार अधिकारियों से ठीक-ठाक थी... बोर्ड के बहुत से रुतबेदार ब्रिजलाल की ठण्ढ़ाई और रात भर चलने वाली ड्रामा मण्डली के दीवाने हो चुके थे... गुलाल सिंह से शहर की कचहरी में एक मुलाक़त ने ब्रिजलाल के मंसूबों को और भी ज्यादा हवा दे दी... ब्रिजलाल को महज इंतजार था कचहरी में चल रहे इस मुकदमे के अपने पक्ष में फैसले का जिसके बाद वह पूरी ताक़त सेठ गुलमोहर दास को नेस्तनाबूत करने में लगा देता... इसीलिये यह मुक़दमा ब्रिजलाल के लिये बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण था और इसमे हार का मतलब था सेठ गुलमोहर दास से हार... कुछ साल पहले गांव में सूखा पड़ने पर किसानों की खड़ी फसल कटवाकर अपने खलिहानों में जमा करने का मुकदमा ब्रिजलाल पर अब तक चल रहा था... एक सोची समझी साजिश के तहत ब्रिजलाल ने गुलाल सिंह को अपने जाल में फंसा लिया... ब्रिजलाल के दिये पैसों की बदौलत जहां गुलाल सिंह की फाईले अपने गंतव्य तक पहुंचने और पहुंच कर रुकने में कामयाब हो सकीं वहीं इसके एवज में गुलाल सिंह ने अपना फर्ज अदा करते हुये ब्रिजलाल की खिलाफत कर रहे किसानों को घेरना शुरू किया... अपने आडंबरी व्यवहार और छद्म गांधीवाद के दम पर गुलाल सिंह ने जल्द ही किसानों का विश्वास जीत लिया... किसान इस बहुरूपिये खद्दड़धारी का विश्वास करने लगे और यहां तक वहीं करने भी लगे... बेचारे सीधे सादे गांव वासियों को इस बात का जरा सा भी एहसास नही हुआ कि वे ना केवल मुकदमा हारने जा रहे हैं बल्कि लूट का आरोप भी उन पर ही मढ़ने की तैयारी की जा चुकी है... ब्रिजलाल की चाल और गुलाल सिंह के स्वार्थ ने ऐसा खेल दिखाया कि अंत में ऐसा ही फैसला आया... इसके बाद ब्रिजलाल और सेठ की शुरू हुयी शह मात की लड़ाई अब तक जारी है ...

गुलमोहर, फागू, गुलाल सिंह, ब्रिजलाल और ग्रामीणों को पात्र बनाकर मेरे द्वारा लिखी गयी इस कहानी पर अब आप या तो कहानी का क्रम खोजेगे या घटनाओं का अंतर्संबंध... लेकिन सामाजिक जगत में घटने वाली इन सार्वभौमिक घटनाओं में मैने कुछ और ही खोजने की कोशिश की है... कोशिश अविष्कारों के सामाजिक पक्ष को खोजने की... निश्चित ही समाज का अस्तित्व इन वैज्ञानिक अविष्कारों के पहले से रहा है... इसलिये वैज्ञानिक अविष्कार भी कही ना कही सामाजिक घटनाओं से प्राभावित रहा है... मैने इन सामाजिक-आर्थिक घटाओं के माध्यम से न्यूटन के उस सार्वभौमिक सिद्धांत को खोज निकाला है जिसकी खोज न्यूटन ने सामज के अस्तित्व में आने के बहुत बाद की थी... न्यूटन की गति के तीन सार्वभौमिक नियम सीधे तौर पर समाज में भी देखे जा सकते हैं...

1... सेठ गुलमोहर दास जब गरीब थे तब झुके हुये थे... अचानक लाटरी लगने के बाद उनकी सामाजिक प्रस्थिति यकायक चमकीली हो गई... वैभव के साथ ही उनके सम्मान की गाड़ी आचानक ही चल पड़ी और वे सबसे दूर हो गये एकांकी हो गये... सीधा मतलब की वे अकड़ के साथ पीछे की ओर तन गये........ वहीं जमींदार गुलाल सिंह की सामाजिक प्रस्थिति अचानक जैसे ही पटरी से उतरी उनकी समाज से दूरी उनकी अकड़ जाती रही और वे विनम्र हो गये... अवसर की तलाश में ही सही वे आगे की ओर झुक गये .......................................................................... न्यूटन के जडत्व का नियम भी यही कहता है... यदि स्थिर वस्तु को अचानक गतिशील किया जाये तो वह पीछे की ओर झुक जायेगी... समाज से अभिमुख हो जायेगी... और यदि गतिशील (वैभवशाली) वस्तु को अचानक रोक दिया जाये तब वह आगे की ओर झुक जायेगी (समाजोन्मुख हो जायेगी)...

2... जमींदार गुलाल सिंह की फाईलें दफ्तर में फाईलों के नीचे दबी रहीं... तब तक दबी रहीं जब तक रिश्वत ना दी गयी... उसी तरह उनकी फाईलें आधी अधूरी रिश्वत की वजह से लगातार गतिशील बनी रही, उनपर कोई निर्णय नही हो पाया जब तक बाकी लोगों को भी रिश्वत पूरी नही दी गयी... तब जा कर फाईल अपने मुकाम तक पहुंचकर फैसला अपने पक्ष में कराने के बाद स्थिर हो पायीं........................................ न्यूटन की गति के बाह्य बल का नियम भी यही कहता है कि यदि कोई वस्तु स्थिर है तो स्थिर और गतिशील है तो गतिशील बनी रहेगी जब तक की उसपर कोई बाह्य बल (रिश्वत) ना लगाया जाये... अब बाह्य बल रिश्वत के साथ ही पहुंच और बाहुबल का भी हो यह संभव है...

3... ब्रिजलाल ने गुलाल सिंह के साथ मिलकर एक छद्म खेल खेला... गुलाल सिंह ने लालच और स्वार्थ में ग्रामीणों को अपने वश में करने के लिये आडम्बर और अभिनय का सहारा लिया... हालात ऐसे हुये कि खेतों की लूट का सही आरोपी ब्रिजलाल बरी हुआ और पीड़ित किसान खुद ही आरोपी की श्रेणी में आ खड़े हुये.....
................................................... न्यूटन की गति का तीसरा नियम क्रिया की प्रतिक्रिया भी यही कहता है कि क्रिया की प्रतिक्रिया बराबर किंतु विपरीत (पीड़ित) दिशा में होती है... खेतों की लूट की क्रिया पर न्यायालय की प्रतिक्रिया तो हुयी लेकिन ब्रिजलाल के बजाय उन ग्रामीणों पर अर्थात विपरित दिशा में...

सामाजिक घटनाओं को अगर ध्यान से देखा जाये तब इस कहानी का व्यवहारिक पक्ष भी साफ दिखायी देता है... कहानी काल्पनिक जरूर है लेकिन यह सामाजिक घटनाओं से प्रेरित और प्रमाणित साक्ष्यों से प्रभावित है...

इस आधार पर यह यह साफ तौर पर कहा जा सकता है कि न्यूटन का नियम समाज और विज्ञान दोनो पर ही समान रुप से लागू होता है... हालांकि यह बात भी उतनी ही सच है कि समाज चुंकी मानवीय व्यवहारों और अंतर्संबंधों की विज्ञान है जहां मानवीय व्यवहार और संबंध लागतार परिवेश के मुताबिक परिवर्तनशील हैं इसलियें इनमें स्थिरता का अभाव है.......... फिर भी न्यूटन के तीनों नियम सामाजिक-आर्थिक अंतर्संबंधों और मानवीय व्यवहारों में कई बार स्पष्ट रुप से देखे जा सकते हैं.....................
.................................. यही है .................................." न्यूटन्स लॉ ऑफ सोशियो-इकॉनामिक मोशन " ....................................

.........संजय उपाध्याय.........
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
मो.नं. 09630522788
07828632377

Wednesday, February 23, 2011

रिटर्न आफ भोपू ......


...एक भोंपू जो कभी जमकर बजा करता था ... न केवल बजा करता था बल्कि इससे निकलने वाली हर आवाज़ लोगों को एक हद तक दीवाना भी बना दिया करती थी ... भोंपू को शायद इस बात का घमंड सा हो गया ... फिर क्या था ... भोंपू ने अपनी हर तान को फरमान का जामा पहनना शुरू कर दिया ... हालात ये बने की अब भोंपू से निकलने वाली आवाज़ अवाम की आवाज़ कम बल्कि लोगो के लिए चुनौतियाँ ज्यादा साबित होने लगीं... भोंपू इन सब बातों से बेफिक्र अपनी धुन में मस्त रहा ... अब भोंपू द्वारा लोगों को दी जा चुकी चुनौतियों की फेहरिश्त इतनी लम्बी हो चली थी की उसे याद रख पाना मुनासिब न रहा ... ऐसे में अपनी आत्ममुग्धता से सराबोर भोंपू ने कुछ नया हंगामा करने की फ़िराक में यह चुनौती दे डाली कि यदि कोई भोंपू उससे ज्यादा तेज बजता है तो वह आज के बाद से सरकारी मंच पर बजना छोड़ देगा ... अब बेचारे भोपू को क्या पता था कि एक वैरागन कोयल कि कूक उसकी दहाड़ती बुलंद आवाज़ पर इतनी भरी पड़ेगी कि उसे ना चाहते हुए भी वैरागी होना पड़ेगा ... एक तब का दिन था कि भोंपू खुद ही अपनी आवाज़ से डरने लगा था ... कुछ बोलना तो दूर बोलने का जिक्र आने पर ही उसे तेज बुखार चढने लगता था ... लेकिन आदत भी तो कोई चीज़ होती है ... जो भोंपू लगातार कई वर्षों तक बजता रहा हो आखिर उसे अपनी यह ख़ामोशी कैसे बर्दाश्त हो ... सो भोंपू ने पहले तो छुप छुप कर बोलने का खूब रियाज़ किया और बाद में ज़रा आत्मविश्वास पैदा होने पर अपने आकाओं को विश्वास दिलाया कि आज भी वह पहले कि तरह सुरीला तो नहीं लेकिन बोल जरूर सकता है ... आकाओं कि सख्त नसीहत पर भोंपू ने संकल्प लिया कि वह सिर्फ वही बोलेगा जो उससे बोलने के लिए कहा जायेगा ...हालाँकि आकाओं ने भोंपू को यह बात अपने अंदाज में कहने कि छूट दे दी ... फिर क्या था भोपू लगा बजने ... भोंपू ने इस बार अपनी गाल बजाई से आकाओं का भी दिल जीत लिया ... यही वजह रही कि आकाओं ने खुश होकर उसे कुछ अपने मन से भी बजने की छूट दे दी ... हालत ये हो चले कि अब देश दुनिया में किसी के मुंह से कोई बात निकली की नहीं कि भोंपू लगा बजने... भोंपू की इस आदत को कोई उम्र का दोष बताता है तो कोई इसे इतने वर्षो कि मंचहीन त्रासदी का आफ्टर शाक करार देता है... मगर भोंपू आज भी पहले की ही तरह बेपरवाह है उसे तो बस इस बात कि खुशी है कि वह फिर से बजने लगा है ... कई बार ऐसे मौके भी आयें जब इस भोंपू के आकाओं ने उसकी आवाज़ को पहचानने ने इंकार तक कर दिया ... मगरस्वामी भक्त भोंपू लगातार बजता ही रहा ... चाहे मंदिर के घड़ियाल हो या मस्जिद कि अजान भोपू ने हर मौके पर अपना गाल बजाना जरी रखा ... ये बात अलग है कि इस भोपू को मंदिर के घडियालों से जुगलबंदी कुछ ज्यादा ही भाती है... बेचारा भोंपू आज अपनी उसी आवाज़ पर लोगों कि हसी का पत्र बन चुका है जिस आवाज़ पर उसे कभी गर्व हुआ करता था ...
...संजय उपाध्याय...

Wednesday, February 9, 2011

टँगी मुसीबतें...

.... आइसक्रीम के पहाड़ , दूध की नदियाँ और पेड़ पर लटकी टाफियां ... एक फ़िल्मी गाने में यह दृश्य देख कर मुझे अनायास ही कुछ ख्याल आया और मै कल्पनाओ के परवाज पर सवार हो उडान भरने लगा ... मैं सोचने लगा कि यदि टाफियों की तरह मुसीबतें भी पेड़ो पर उगा करती तब कैसा होता ... सभी के अपने घर और उस घर के पेड़ों पर साफ़ साफ़ लटकती अपनी अपनी मुसीबतें ... मै कुछ इसी उधेड़बुन मे लगा ही था कि तभी सफ़ेद घोड़े पर सवार एक यक्ष दहाड़ता मेरे सामने प्रगट हो गया ... तीखे तेवर अपनाता स्निग्ध श्वेत वर्णी यक्ष मुझसे कुछ कहता उससे पहले ही मै बोल उठा ... आखिर मेरा कसूर क्या है ... यक्ष अपना तेवर बदले बिना लगभग उसी अंदाज मे बोला " मृत्युलोक में रहकर भी स्वर्गलोक की कल्पना... मेरे अन्दर मची हलचल से बिलकुल अनभिज्ञ यक्ष तभी नसीहत के अंदाज में बोला ... अगर लोगों की मुसीबतें यु पेड़ों पर लटकी अगर दिखाई देने लगी तब दुनिया में तो हर शख्स खुशहाल हो गायेगा... यक्ष की बातें मुझे पहेली की तरह लगने लगीं ... यक्ष ने अपनी बात जरी रखतें हुए कहा " इन्सान अपनी ख़ुशी से कम खुश मगर दूसरों के गम से बहुत ज्यादा आल्हादित रहता है ... अगर ऐसे में वह अपने पड़ोस के पेड़ पर लटकती मुसीबतों को देखता रहेगा तब इस बात का सवाल ही नहीं की वह कभी दुखी हो ... भले ही उसका खुद का पेड़ मुसीबतों से भरा हो मगर उसे इस बात का सुकून होगा की उसके पडोसी के घर कुछ ही सही मगर मुसीबत तो है ... इस हालत में गम के क्विन्तालों बोझ तले दबे चेहरों पर भी सुकून की एक कुटिल ही सही मगर मुस्कान जरूर होगी... और यही तो स्वर्गलोक है जहा सभी के दिलों मैं सुकून हो और चेहरों पर मुस्कान"... यक्ष की बातें अब मुझे कुछ कुछ समझ आने लगी थीं ... तभी स्वप्ना टूटा और मैं बहार निकल कर लोगों से नजरें बचाता हुआ कोई पेड़ तलाशने लगा ...

..... "प्रधानमंत्री जी"

...... "प्रधानमंत्री जी" मै सचमुच बेहद हैरान हूँ .... आखिर कोई इस तरह आप की उपेक्षा कैसे कर सकता है ... आप देश की कार्यपालिका के मुखिया हैं ... देश की संवैधानिक शक्तियों के अनुपालन का वैधानिक सोता भी आप की गंगोत्री से ही फूटता है ... फिर ऐसे में आप को हर बार दरकिनार कैसे किया जा सकता है... और आखिर ये लोग कौन है जो ऐसा करने पर लगातार आमादा है... क्या आप इन्हें पहचान नहीं पा रहे है या पहचान कर भी मजबूर है ... यह आप की कोई राजनैतिक विवशता है या व्यक्तिगत निष्ट का मसला ... सवालो की तो एक लम्बी फेहरिस्त है मगर जवाब ही नहीं मिल रहे हैं ... पहले आप के ही एक मंत्री राजा पर आप के आदेशों की नाफरमानी का आरोप लगा , फिर मुख्या सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति में आपको अँधेरे में रखने की बात सामने आयी... देश में आयोजित commenwelth गेम्स में पूरी दबंगई के साथ हुए अरबो के भ्रष्टाचार की खबर पूरी दुनिया में सुर्खियाँ बन आप को मुह चिढाती रहीं ... आखिर आप का ही तो चेहरा इस दुनिया की सबसे बड़ी दूसरी आबादी का प्रतिनिधि है ... आखिर हद तो तब हो गयी जब सीधे तौर पर आप कि अध्यक्षता वाले अंतरिक्ष आयोग से भ्रष्टाचार कि सड़ांध बहार निकली और वह भी इस देश के सबसे बड़े संभावित घोटाले के रूप में ... हर बार हमें सरकार के नहीं बल्कि एक पार्टी के प्रवक्ता के द्वारा बताया जाता रहा कि जो भी हुआ है वह सरकार को, मतलब आप को, अँधेरे में रख कर किया गया है ... प्रधानमंत्री जी ऐसा तो तभी हो सकता है जब या तो सरकार पर नौकरशाही हावी हो या फिर सरकार के मुखिया के तौर पर कोई छद्म चेहरा महज दिखावे के लिए जनता जनार्दन के सामने रखा गया हो ... अजेय नौकरशाही को वश में रखने का आपकी पार्टी का पुराना दावा है... " सरकार चलाना आता है ".... फिर ऐसे में न चाह कर भी इस दुसरे विकल्प कि ओर निगाहे अनायास ही ताकने लगती है , प्रधानमंत्री जी आप दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र के महानायक है... इस लिहाज से आप इस देश के सर्वाधिक ताकतवर व्यक्ति है ... शायद देश कि जनता यह स्वीकार न कर पाये कि निर्णयन और नियमन के इस सोपान क्रम में इस देश के संविधान के आलावा भी कोई है जो आप के ऊपर है .... जनता को प्रधानमंत्री कि दरकार है नाकि सुपर प्रायीमिनिस्टर की...

Wednesday, February 2, 2011

बेहद शर्मनाक

शर्मनाक, सचमुच बेहद ही बेहयाई भरा आचरण .... मुख्य सतर्कता आयुक्त पी जे थामस के मामले में देश की केंद्रीय सरकार का संपूर्ण व्यक्तित्व निश्चित ही कुछ इस प्रकार की श्रेणी में ही नजर आ रहा है ... मुख्य सतर्कता आयुक्त जैसे महत्वपूर्ण और साथ ही गरिमा युक्त पद पर पी जे थामस की नियुक्ति को इतना वक्त निकल जाने के बाद आज शायद सरकार की याददाश्त भी धुधली हो चली है... याददाश्त के धुधली होने की वजह भी इतनी मजबूरी भरी है की यदि ऐसे में कुछ याद आ भी जाए तो उसे मानने की जिगर गवाही नहीं देता... पामोलिन स्केंडल में थामस का नाम शुमार होने के बाद भी उन्हें इस पद से नवाजे जाने की यु पी ए सरकार की ऐसी कौन सी मजबूरी थी इस बात का खुलासा तो अब तक नहीं हो पाया है लेकिन इस मसले पर देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था को लगातार गुमराह किये जाने के केंद्र सरकार की नियत से तो इतना साफ हो चुका है कि सरकार कही ना कही दबंगई के साफ मूड में है ... थामस पर आरोप की जानकारी को सिरे से ख़ारिज करने वाली सरकार के एक प्रभावशली मंत्री पी चिताम्बरम कि इस मसले पर स्वीकारोक्ति के बाद यह पूरा मामला खुद ही आईने कि तरह साफ हो जाता है ... चिदंबरम की अपने ओरसे यह स्वीकारोक्ति भी उस वक्त आती है जब सी वी सी कि नियुक्ति के लिए बनाये गए पैनल कि एक सदस्य सुष्मस्वराज इस पूरे मामले का कच्चा चिट्टा खोलने के लिए सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर करने कि तैयारी कर लेती है , जिन्होंने उस वक्त आरोपों से घिरे थोमस कि नियुक्ति पर सवाल खड़े किये थे ... संपूर्ण उत्तरदायित्व के सिद्धांत पर काम करने वाले मंत्रिमंडल का इसे अब कौन सा रूप कहा जाए जहा कि मंत्रिमंडल के प्रभावशली सहयोगियों के बीच ही परस्पर मतान्तर है और वह भी सर्वोच्च न्यायिक संस्था के अत्यंत ही तीखे और सरकार के सार्वजनिक उत्तरदायित्व जैसे बेहद गंभीर सवाल पर... इस नाटकीय घटनाक्रम ने जाहिर तौर पर सरकार के चेहरे को तो बेनकाब कर ही दिया है लेकिन देखना यह होगा कि सरकार के इस बेहद ही गैर जीम्मेदाराना कृत्य को न्याय का सर्वोच्च मंदिर किस रूप में लेता है ... यह न्याय का वही मंदिर है जिसकी ओर देखकर शायद सूर्यनमस्कार भी आम आवाम के लिए अवमानन कि श्रेणी में आता है ... निःसंदेह सुर्खिया रोज ही बदल जाया करती है ... मगर मिसाल हमेशा कायम रहा करती हैं ... उम्मीद है कि सरकार की यह बेहयाई कभी मिसाल नहीं बन पायेगी...

Friday, December 31, 2010

कानून के हाथ कितने लम्बे .....

कहावत बड़ी पुरानी है .... कानून के हाथ बड़े लम्बे होते है ... लेकिन कितने लम्बे अब यह सोचने का वक्त आ गया है... इस जुमले पर अब इसलिय फिर से विचार मंथन की जरूरत महसूस होने लगी है क्योकि देश की एक सबसे बड़ी संस्था ने ऐसा सोचने पर मजबूर कर दिया है ... सी बी आई ने आयुषी हत्याकांड की जाँच आगे जरी रखने में असमर्थता जाता दी है ... सी बी आई का कहना है कि आगे कोई बात सूझ नहीं रही है ... सबूत आपस में एक दुसरे को ही मूह सा चिड़ाने लगे है ... अब ऐसे में और भी ज्यादा भद्दकरने से बेहतर है कि दोनों हाथ खड़े कर दिए जाएँ ... सी बी आई जैसी सुप्रीम संस्था का ऐसा निरिहपन कई मायनो में चौकाने वाला है ... सी बी आई ने ऐसा बयां जारी कर ना केवल कानून के बौनेपन कि ओर इशारा किया है बल्कि कही ना कही उन संसथाओ कि नैतिकता पर भी वार किया है जो इन्हें अपना आदर्श मानती है... सी बी आई के इस बयां के बाद नाकेवल एक सनसनी खेज मर्डर मिस्त्री कि maut हो गई है बल्कि उन लाखों करोडो देशवासियों को भी तगादा मानसिक आघात पहुंचा है जो इस पूरे मामले में सी बी आई कि ओर आशा भरी निगाहों से देख रहे थें ... बहार हाल अब यह आसानी से कहना लाजमी न होगा कि कानून के हाथ बड़े लम्बे होतें है ....